Tuesday, February 09, 2016

तुम ये कैसे जुदा हो गये - निदा फ़ाज़ली साहब



8th February was the birth anniversary of my all time favourite Jagjit sahab - who modernised and popularised the Gazal. However, as I grew up and listened to his Gazals more, I realised that he would not have been able to achieve this feat without lyricists and shayars who wrote deep and yet simple, sarcastic and yet sweet, urdu and yet friendly to those who do not know urdu.

Its an irony of fate that the supreme of all such shayars - Nida Fazli Sahab - left for his heavenly abode also on the 8th of Feb.
So when I sat to write a few words about Nida sahab - I was wondering what would be the best ode to his rich legacy - and then - it dawned upon me. Nida sahab was one of those for whom we could use the hindi phrase - जिनका काम बोलता है. So what better than just meandering through some of his work in his memory - so join me in this quick revision - hope this keeps him alive in our memories

Lets start with a few shers from a मासूम creation
गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला 
चिड़ियों को दाना, बच्चों को गुड़धानी दे मौला 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है 
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला 

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो 
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला

Nida chose to stay in India at Partition whereas his parents went to Pakistan - he loved his country
हमने भी सोकर देखा है नये-पुराने शहरों में
जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है ।

An eternal optimist - he had a very modest childhood
इस धरती पर आकर सबका, अपना कुछ खो जाता है,
कुछ रोते हैं, कुछ इस ग़म से अपनी ग़ज़ल सजाते हैं।

His shayari was something one easily associated with - they had deep philosophical roots and yet so simply expressed - here is a veritable feast of his deep thoughts
उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला



इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर में जाने वाला
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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं 
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं 
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मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का 
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए
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दीवार-ओ-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैं 
कोई नहीं बोलता जब तनहाइयाँ बोलती हैं

सुन ने की मोहलत मिले तो आवाज़ है पतझरों में 
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं
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दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है 
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं 
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है
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कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है 
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है

उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों 
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है
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जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है 
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है
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ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई 
जो आदमी भी मिला बनके इश्तहार मिला
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जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी
सन्नाटों में आग लगा दी

मिट्टी उस की पानी उस का
जैसी चाही शक्ल बना दी
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दानाओ (बुद्धिमानो) की बात न मानी, काम आयी नादानी ही
सुना हवा को, पढ़ा नदी को, मौसम को उस्ताद किया
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हर जीवन वही विरासत आँसू सपना चाहत मेहनत
साँसों का हर बोझ बराबर जितना तेरा उतना मेरा
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घी मिस्री भी भेज कभी अखबारों में
कई दिनों से चाय है कड़वी या अल्लाह

Nida Sahab wrote such delightful couplets associated with children. He verbalised some really close observations through kids - here are samples

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो 
चार किताबें पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे

किन राहों से दूर है मंज़िल कौन सा रस्ता आसाँ है
हम जब थक कर रुक जायेंगे औरों को समझायेंगे
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जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चिराग़ों को हवाओं से बचाया जाये 
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जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया.

भाग रही है गेंद के पीछे जाग रही है चाँद के नीचे
शोर भरे काले नारों से अब तक डरी नहीं है दुनिया.
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And he was quite derisive of religious fanaticism. Wrote extensively on humanism

बृन्दाबन के कृष्ण कन्हैय्या अल्लाह हू
बँसी राधा गीता गैय्या अल्लाह हू

मौलवियों का सजदा पंडित की पूजा
मज़दूरों की हैय्या हैय्या अल्लाह हू
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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें 
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये
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तू ही फूल सितारा सावन हरियाली
और कभी तू नागासाकी या अल्लाह
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उसी के चलने-फिरने, हंसने-रोने की हैं तस्वीरें 
घटा क्या, चाँद क्या, संगीत क्या, बाद-ए-बहारी क्या

किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूँढ उसको 
जो चोटी और दाढ़ी में रहे वो दीनदारी क्या
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मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये 
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना 
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Most people would remember simply delightful दोहे - two simple lines of wisdom - casually (apparently) sung by Jagjit Saheb
सब की पूजा एक सी, अलग अलग हर रीत 
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाये गीत 

पूजा घर में मूर्ती, मीरा के संग श्याम 
जितनी जिसकी चाकरी, उतने उसके दाम 
मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार 
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार 

सीता, रावण, राम का, करें विभाजन लोग 
एक ही तन में देखिये, तीनों का संजोग 

मिट्टी से माटी मिले, खो के सभी निशां 
किस में कितना कौन है, कैसे हो पहचान
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Just feel what he wrote for the emotional relationship we know as "Mother"
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ ।

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे ,
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ ।

बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गई ,
फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी माँ ।
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Need some motivation in life - read these
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम 
थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे 

गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो 
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे
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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो 
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है 
वो मिले या न मिले हाथ बढा़ कर देखो
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किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो
कोई फ़ज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो.

दुआ सलाम ज़रूरी है शहर वालों से
मगर अकेले में अपना भी एहतराम करो.

ख़ुदा के हुक्म से शैतान भी है आदम भी
वो अपना काम करेगा तुम अपना काम करो.
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सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा
दरिया हुआ है गुम तो समुंदर तलाश कर.

रहता नहीं है कुछ भी यहाँ एक सा सदा
दरवाज़ा घर का खोल के फिर घर तलाश कर.

कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन
फिर उस के बाद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर.
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यक़ीन चाँद पे सूरज में ऐतबार भी रख
मगर निगाह में थोड़ा सा इंतिज़ार भी रख.

ख़ुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को
बदलते वक़्त पे कुछ अपना इख़्तियार भी रख.

पहाड़ गूँजें नदी गाए ये ज़रूरी है
सफ़र कहीं का हो दिल में किसी का प्यार भी रख.
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Sorry if you find that I am being unstoppable - so was Nida sahab. Here is the Romantic Nida 
ख़ुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी 
झुकती आँखों ने बताया मयकशी क्या चीज़ है

हम लबों से कह न पाये उन से हाल--दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
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And here is the Angry - frustrated Nida (Written when Malala was shot at)
मलाला मलाला
आँखें तेरी चाँद और सूरज
तेरा ख़्वाब हिमाला...

तुझ पे चलने वाली गोली हर धड़कन में है
एक ही चेहरा है तू लेकिन हर दर्पण में है
तेरे रस्ते का हमराही, नीली छतरी वाला, मलाला मलाला
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I can go on - so will Nida saheb's writing - if nida saheb was to write a few lines now that he is no more - he already wrote them - here 
उठ के कपड़े बदल 
घर से बाहर निकल 
जो हुआ सो हुआ॥

खून से तर-ब-तर
कर के हर राहगुज़र 
थक चुके जानवर 
लकड़ियों की तरह 
फिर से चूल्हे में जल
जो हुआ सो हुआ॥

जो मरा क्यों मरा
जो जला क्यों जला
जो लुटा क्यों लुटा
मुद्दतों से हैं गुम 
इन सवालों के हल 
जो हुआ सो हुआ॥
******

All that I can say in the end that like many writers/authors/shayars of his ilk he deserved more popularity and recognition (not that he did not get it - but more)
मुँह की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में
ख़ामोशी पहचाने कौन।

किरन-किरन अलसाता सूरज
पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन।

Bahut Khub Nida Sahab. Rest in Peace